जंतर मंतर दमन 2026: CJP विरोध, 7000 हिरासत और सुप्रीम कोर्ट का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को आपातकालीन सुनवाई बुलाई। Senior Advocate ने कहा — हम एक पुलिस राज्य से एक कदम दूर थे। कोर्ट ने सरकार को अवमानना नोटिस दिया
जंतर मंतर पर दमन:
लोकतंत्र की आवाज़ को कुचलने की कोशिश
CJP का विरोध प्रदर्शन, 6,000–7,000 की हिरासत, विमान में गिरफ्तारी, सुप्रीम कोर्ट की आपातकालीन सुनवाई — और जंतर मंतर को "डी-नोटिफाई" करने तक की पूरी कहानी।
पृष्ठभूमि: SIR और एक आंदोलन का जन्म
भारत के निर्वाचन आयोग ने 2025 के मध्य में मतदाता सूचियों का "स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न" (SIR) शुरू किया। आयोग के अपने आंकड़ों के अनुसार इस प्रक्रिया में लगभग 13.3 करोड़ (130 मिलियन) मतदाताओं के नाम सूचियों से हटाए गए — यह संख्या जापान की पूरी आबादी से ज्यादा है।
निर्वाचन आयोग का तर्क था कि मृत, स्थानांतरित और अपात्र मतदाताओं को हटाया जा रहा है। लेकिन विपक्षी दल, नागरिक समाज और युवा संगठनों ने आरोप लगाया कि इतने बड़े पैमाने पर नाम हटाना BJP को चुनावी लाभ देने की सुनियोजित साजिश है।
"वोटर्स को सरकार चुनना था, अब सरकार वोटर्स चुन रही है।"
— अभिजीत डिप्के, CJP संस्थापक
इसी पृष्ठभूमि में एक व्यंग्यात्मक ऑनलाइन अभियान से जन्मी "कॉकरोच जनता पार्टी" (CJP) देखते ही देखते देश की सबसे मुखर युवा-नेतृत्व वाली राजनीतिक शक्ति बन गई। इससे पहले, CJP ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर "Jantar Mantar 1.0" प्रदर्शन किया था, जो सफल रहा। अब बारी थी CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की — "Jantar Mantar 2.0"।
घटनाओं का क्रमिक विवरण
धृव राठी: घर से उठाया, आवाज़ को दबाने की कोशिश
गिरफ्तारी कैसे हुई
10 अक्टूबर 2026 की सुबह, लगभग 50 पुलिसकर्मी गुरुग्राम के सेक्टर 56 में धृव राठी के निवास पर पहुंचे। जब राठी ने विरोध प्रदर्शन में भाग लेने से इनकार नहीं किया, तो उन्हें प्रिवेंटिव डिटेंशन में ले लिया गया। CJP ने उनकी तत्काल रिहाई की मांग की।
धृव राठी का बयान
"यह इमरजेंसी जैसी स्थिति है। कम से कम इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी घोषित की थी।"
— धृव राठी, अपनी हिरासत के बाद
राठी ने तुलना करते हुए कहा कि 1975 के आपातकाल में भी जो नहीं हुआ, वह आज हो रहा है — किसी पत्रकार को उसके घर से, बिना किसी FIR के, केवल इसलिए उठाया जा रहा है क्योंकि वह शांतिपूर्वक प्रदर्शन में हिस्सा लेना चाहता था।
पुलिस सूत्रों के अनुसार, CJP नेताओं या स्वयंसेवकों के खिलाफ कोई FIR दर्ज नहीं थी। सभी को केवल "प्रिवेंटिव डिटेंशन" के तहत रखा गया — यानी बिना किसी आरोप के। अधिकांश को कुछ घंटों बाद रिहा किया गया।
मीडिया पर हमला
धृव राठी की गिरफ्तारी मीडिया दमन का प्रतीक बन गई। गोदी मीडिया बनाम स्वतंत्र मीडिया की लड़ाई और तेज हो गई। कई मुख्यधारा के चैनलों ने विरोध प्रदर्शन को या तो नजरअंदाज किया या सरकार का पक्ष लेते हुए "अव्यवस्था" और "भड़काऊ नेताओं" की बात की। वहीं independent journalists, YouTubers और international media ने सच्चाई सामने रखी। पत्रकारों को भी रोका गया, पीटा गया, उनके उपकरण जब्त किए गए।
पुलिस बर्बरता, बाहरी गुंडे और बिना बैज के "पुलिसकर्मी"
बिना बैज के पुलिसकर्मी — सुप्रीम कोर्ट में उठा मुद्दा
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में Senior Advocate गोपाल शंकरनारायणन ने तस्वीरें और वीडियो पेश करते हुए बताया:
"पुलिसकर्मी बिना बैज के काम कर रहे थे। मैंने जून से बार-बार यह मुद्दा उठाया है। कमेटी को रिप्रेज़ेंटेशन दी, कुछ नहीं हुआ।"
— Sr. Advocate गोपाल शंकरनारायणन, सुप्रीम कोर्ट, 11 अक्टूबर 2026
एक महिला वकील ने कोर्ट को बताया: "जिस महिला पुलिसकर्मी ने मुझे धकेला, उसके पास कोई बैज नहीं था। मुझे नहीं पता वह दिल्ली पुलिस की थी या कोई और।" यह एक गंभीर संवैधानिक उल्लंघन था।
हिंदू रक्षा दल के गुंडे — पुलिस ने खुद FIR दर्ज की
सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह था: दिल्ली पुलिस ने खुद ही 20 FIR दर्ज कीं उस दिन हुई विभिन्न घटनाओं पर। इनमें से एक FIR कमला मार्केट थाने में दर्ज हुई, जिसमें हिंदू रक्षा दल से जुड़े चार लोगों को गिरफ्तार किया गया — इन पर आरोप था कि उन्होंने छात्रों पर हमला किया और महिला प्रदर्शनकारियों के साथ बदसलूकी की।
एक CRPF अधिकारी ने NHRC (राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग) और NCW (राष्ट्रीय महिला आयोग) को पत्र लिखकर "prima facie mistreatment" की जांच की मांग की। महिला प्रदर्शनकारियों के साथ हुए दुर्व्यवहार की जांच की मांग की गई।
हिरासत का "मेरी-गो-राउंड": The Print की रिपोर्ट
The Print ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट में खुलासा किया कि 3,500+ प्रदर्शनकारियों को बसों, जेल वैन, तीन स्टेडियम और दिल्ली के बाहर के स्थानों पर घंटों रखा गया। कोई एक हिरासत केंद्र नहीं था — प्रदर्शनकारियों को जान-बूझकर इधर-उधर घुमाया गया ताकि वकील उन तक न पहुंच सकें।
एक 46 वर्षीय महिला ने बताया: "स्टेडियम में पुलिस की गाड़ियां बार-बार नए लोगों को लेकर आ रही थीं। महिलाओं के लिए यह असुरक्षित था।"
सुप्रीम कोर्ट में Senior Advocate शादान फरासत का बयान
"कल शहर में जो माहौल था, उसे मैं बेहद दमनकारी कह सकता हूँ। कोई व्यक्ति सड़क पर खड़ा भी नहीं हो सकता था। मुझे एक चलती बस में धकेल दिया गया। यह मेरी व्यक्तिगत बात नहीं है — यह नागरिकों के विरोध के अधिकार की बात है। हम एक पुलिस राज्य से एक कदम दूर थे।"
— Sr. Advocate शादान फरासत, सुप्रीम कोर्ट, 11 अक्टूबर 2026
महिला प्रदर्शनकारियों पर विशेष दमन
SFI ने 11 अक्टूबर को कनॉट प्लेस पर महिला प्रदर्शनकारियों की रैली बुलाई। जैसे ही महिलाएं इकट्ठी हुईं, पुलिस ने शाम 6 बजे के बाद भी उन्हें हिरासत में लेना शुरू किया। वीडियो में एक चीखती महिला को कई महिला पुलिसकर्मी घसीटती दिखीं।
35,000 पुलिस-अर्धसैनिक: एक लोकतंत्र या युद्धक्षेत्र?
10 अक्टूबर को दिल्ली में जो तैनाती हुई, वह किसी युद्धक अभियान से कम नहीं थी:
- 35,000+ पुलिस और CAPF (Central Armed Police Forces) जवान
- 45 मेट्रो स्टेशन प्रवेश-निकास के लिए बंद
- पीली धातु की बाधाएं प्रमुख सड़कों पर
- कई अंतरशहरी ट्रेनें दिल्ली में नहीं रुकीं
- सुप्रीम कोर्ट के बाहर तक धारा 163 BNSS
- 45 अस्थायी हिरासत केंद्र
- केंद्रीय दिल्ली में मोबाइल इंटरनेट बंद
- घरों पर छापे, NCR (गुरुग्राम, नोएडा) में भी रोकटोक
वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में कहा: "क्या सरकार बिना आपातकाल घोषित किए आपातकाल ला रही है? Article 19 के अधिकार केवल Emergency में छीने जा सकते हैं।"
मेनका गुरुस्वामी ने 1975 के आपातकाल का हवाला देते हुए कहा: "पिछली बार जब इस कोर्ट को ऐसी चुनौती का सामना करना पड़ा था, वह Emergency के दौरान था। कोर्ट ने ADM Jabalpur का निर्णय दिया था — जिसे बाद में गलत माना गया। आज आपके पास वह गलती न दोहराने का अवसर है।"
सुप्रीम कोर्ट: 11 अक्टूबर का ऐतिहासिक आदेश
जस्टिस जॉयमल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने रविवार की सुबह आपातकालीन सुनवाई की। Kapil Sibal, Menaka Guruswamy, Gopal Sankaranarayanan, Arundhati Katju, Sanjay Hegde, KK Venugopal बनाम Solicitor General Tushar Mehta।
सुप्रीम कोर्ट का 11 अक्टूबर आदेश — मुख्य बिंदु
- 1. मेट्रो और रेल सेवाएं सामान्य अनुसूची के अनुसार चलेंगी
- 2. लोगों का स्वतंत्र आवागमन — केवल यातायात नियमों के अधीन; बाधाओं की समीक्षा तत्काल
- 3. इंटरनेट सेवाएं अबाध रहेंगी (IT Act के प्रावधानों के तहत)
- 4. धारा 163 के क्षेत्र के बाहर कोई गैरकानूनी हिरासत नहीं
- 5. वकील, पत्रकार और पेशेवर अपने कर्तव्यों में बाधित नहीं होंगे
- 6. सुप्रीम कोर्ट के बाहर का धारा 163 का बोर्ड तुरंत हटाया जाए
- 7. सरकार पर अवमानना नोटिस — मंगलवार तक जवाब दें
- 8. मानचित्र सहित बंद मेट्रो स्टेशनों की जानकारी कोर्ट को दी जाए
"हम संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत मौलिक अधिकारों की रक्षा और उन्हें लागू करने के लिए बाध्य हैं। हम राष्ट्र की सेवा में हमेशा तत्पर हैं।"
— जस्टिस जॉयमल्य बागची, सुप्रीम कोर्ट, 11 अक्टूबर 2026
9 अक्टूबर के आदेश की अवमानना
यह और भी गंभीर था कि कोर्ट ने 9 अक्टूबर को पहले ही आदेश दिया था। उसके बावजूद: 45 मेट्रो स्टेशन बंद रहे, नई दिल्ली और निजामुद्दीन स्टेशन बंद, धारा 163 सुप्रीम कोर्ट के बाहर तक, 7,000+ लोग हिरासत में। यह सरकार द्वारा न्यायपालिका की खुली अवज्ञा था।
ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की चुप्पी
जिन ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग लाखों लोग कर रहे थे, वे लगातार मौन रहे। पूरे आंदोलन के दौरान उन्होंने कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की, कोई सार्वजनिक बयान नहीं दिया।
ज्ञानेश कुमार भारत के 26वें मुख्य निर्वाचन आयुक्त हैं। उनकी नियुक्ति नई विवादास्पद प्रक्रिया के तहत हुई जिसमें CJI की जगह सरकार नामित मंत्री को रखा गया। इस नियुक्ति प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दी गई है। इसके अलावा, J&K में Article 370 हटाने और राम मंदिर ट्रस्ट बनाने में उनकी भूमिका रही है।
निर्वाचन आयोग ने केवल एक बयान जारी किया: "SIR की प्रक्रिया सही है। गलती से हटाए गए मतदाता पुनः नामांकन कर सकते हैं।" यह बयान उन लाखों लोगों के लिए पर्याप्त नहीं था जिनके नाम पहले ही कट चुके थे।
Amnesty International ने भी आयोग की इस चुप्पी और SIR की प्रक्रिया पर चिंता जताई।
ताज़ा अपडेट (13 अक्टूबर 2026)
डिप्के, रांका, दास — शर्त के साथ रिहाई
CJP के तीनों शीर्ष नेताओं को "शर्त के साथ" रिहा किया गया: एक साल तक ऐसी कोई गतिविधि नहीं जो "शांति भंग" करे। CJP ने इसे "अस्वीकार्य दमन की शर्त" बताया।
सोमवार का महा-मार्च
12 अक्टूबर को हज़ारों की तादाद में लोग सड़कों पर उतरे — सुप्रीम कोर्ट के आदेश और CJP की हिम्मत दोनों ने मिलकर एक नई लहर बनाई।
मानवाधिकार विश्लेषण: क्या हुआ जो नहीं होना चाहिए था
संवैधानिक उल्लंघन
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) के तहत अभिव्यक्ति और शांतिपूर्वक एकत्र होने का अधिकार मौलिक है। 10 अक्टूबर को जो हुआ:
- विमान के अंदर नेताओं की हिरासत — ऐसा Emergency में भी नहीं हुआ
- दिल्ली के बाहर, ट्रेनों में, घरों में लोगों को रोकना — किसी कानूनी प्रावधान के तहत नहीं
- बिना बैज के पुलिसकर्मी — पहचान छुपाकर बल प्रयोग
- 45 अनौपचारिक हिरासत केंद्र — कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन
- सुप्रीम कोर्ट के आदेश की खुली अवमानना
प्रेस की स्वतंत्रता
पत्रकारों को रोका गया, पीटा गया, उनके उपकरण जब्त किए गए। वकीलों के फोन तक जब्त किए गए जिनमें संवेदनशील मुवक्किलों की जानकारी थी।
"हमारे AOR के फोन जब्त किए गए जिनमें संवेदनशील याचिकाकर्ताओं की जानकारी थी। यह Article 21 का उल्लंघन है।"
— एक अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट, 11 अक्टूबर
निष्कर्ष: यह सिर्फ एक विरोध नहीं, एक परीक्षा है
जंतर मंतर पर जो हुआ वह सिर्फ एक राजनीतिक घटना नहीं है। यह एक बुनियादी सवाल है — क्या भारत में नागरिक शांतिपूर्वक विरोध कर सकते हैं? क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन होगा? क्या मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा होगी?
एक ऐसे देश में जहाँ विपक्ष के 4 पूर्व मुख्यमंत्री हिरासत में लिए जाएं, जहाँ वकीलों को सुप्रीम कोर्ट के बाहर से उठाया जाए, जहाँ 7,000+ नागरिकों को बिना किसी आरोप के कुछ घंटों के लिए बंधक बनाया जाए, जहाँ बाहरी गुंडे बिना बैज के प्रदर्शनकारियों को पीटें — वहाँ यह सवाल उठना जायज है कि लोकतंत्र का स्वास्थ्य कैसा है।
लेकिन उतनी ही बड़ी बात यह है कि आंदोलन झुका नहीं। जंतर मंतर डी-नोटिफाई हुआ, तो CJP उसमें घुस गई। नेता हिरासत में गए, तो नए नेता सामने आ गए। AISA की नेहा बोरा ने कहा: "सौ जंतर मंतर खिलेंगे!"
"लोकतंत्र केवल मतदान का अधिकार नहीं, आवाज़ उठाने का अधिकार भी है।"
— संविधान की मूल भावना